ये परिवारों का सबसे आम सवाल है: “वो मानता ही नहीं। कहता है मुझे कोई लत नहीं है। हम क्या करें?” सबसे पहले ये जान लें — आप अकेले नहीं हैं, और रास्ते हैं। इलाज से मना करना हार नहीं है, बस शुरुआत का तरीका बदलना पड़ता है।

पहले ये समझ लें — मना करना भी बीमारी का हिस्सा है
नशा दिमाग़ के उस हिस्से को बदल देता है जो फ़ैसले लेता है। इसलिए “मुझे कोई problem नहीं” कहना ज़िद या बेशर्मी नहीं — बीमारी का लक्षण है (इसे denial कहते हैं)। ये समझते ही गुस्सा थोड़ा कम होता है और रास्ता दिखने लगता है।
जो तरीके काम नहीं करते (और नुकसान करते हैं)
- ताने और बेइज़्ज़ती — “नशेड़ी”, “नालायक” जैसे शब्द शर्म बढ़ाते हैं, और शर्म नशे की सबसे बड़ी खुराक है।
- रोज़ की लड़ाई और धमकियाँ — जो धमकी आप पूरी नहीं करेंगे, वो देना बंद करें; बात का वज़न खत्म हो जाता है।
- चुपके से खाने में “देसी दवा” मिलाना — ये ख़तरनाक है। बिना डॉक्टर के कोई भी दवा जान का जोखिम है, और पकड़े जाने पर भरोसा हमेशा के लिए टूटता है।
- ज़बरदस्ती उठवाकर ले जाने वाले “pickup” केंद्र — बालिग़ व्यक्ति को उठवाकर बंद करना क़ानूनी रास्ता नहीं है; ऐसे केंद्रों में मार-पीट के मामले भी सामने आते रहे हैं। इनसे दूर रहें।
जो धीरे-धीरे काम करता है
- सही मौक़ा चुनें — जब वो नशे में न हो, आस-पास लोग न हों; अक्सर पछतावे के पल (तबीयत बिगड़ने, पैसे या इज़्ज़त के नुकसान के बाद) सबसे अच्छा मौक़ा होते हैं।
- “तू” नहीं, “मैं” से बात शुरू करें — “मुझे तेरी फ़िक्र है, मैं डर जाता हूँ” — पूरा तरीका यहाँ पढ़ें: बात कैसे करें।
- पूरा इलाज नहीं, छोटा कदम माँगें — “बस एक बार डॉक्टर से मिल ले, आगे का फ़ैसला तेरा” — एक मुलाक़ात के लिए हाँ कहना आसान होता है, और वहीं से रास्ता खुलता है।
- भरोसे वाले आदमी की मदद लें — कोई दोस्त, बड़ा भाई, मामा, गुरुजी — जिसकी बात वो टालता नहीं।
- ग़लती से मदद (enabling) बंद करें — उसके कर्ज़ न चुकाएँ, उसके झूठ में साथ न दें, नशे के पैसे न दें। नशे के नतीजे उस तक पहुँचने दें — यही अक्सर आँख खोलते हैं।
- सबसे ज़रूरी: आप ख़ुद counselor से मिलें — मरीज़ के बिना भी परिवार की counseling शुरू हो सकती है। Counselor आपको आपके घर के हिसाब से तरीका सिखाएगा — और अक्सर परिवार के बदलते ही मरीज़ भी इलाज तक आ जाता है।
ज़बरदस्ती भर्ती कराना — सही या ग़लत?
क़ानूनन इलाज के लिए व्यक्ति की सहमति ज़रूरी होती है। ज़बरदस्ती बंद कराने से भरोसा टूटता है और निकलते ही दोबारा नशा (relapse) बहुत आम है। हाँ — अगर हालत बहुत गंभीर है (ख़ुद को या दूसरों को नुक़सान का ख़तरा), तो psychiatrist से मिलकर क़ानूनी रास्ता पूछें — Mental Healthcare Act 2017 में ऐसे हालात के लिए प्रावधान हैं। ये कदम हमेशा डॉक्टर की सलाह से ही उठाएँ, ख़ुद से नहीं।
कब इंतज़ार बिल्कुल नहीं करना
- बेहोशी, धीमी/रुकती साँस, नीले होंठ (overdose) → तुरंत 108।
- ख़ुद को नुक़सान पहुँचाने या मरने की बात करे → उसी दिन मदद — Tele-MANAS 14416 या डॉक्टर।
- घर में हिंसा हो रही हो → पहले अपनी और बच्चों की सुरक्षा।
याद रखें
ज़्यादातर लोग पहली बार में “ना” ही कहते हैं — और फिर भी उनमें से बहुत से इलाज तक पहुँचते हैं। “ना” आज का जवाब है, हमेशा का नहीं। आपका शांत रहना, सही तरीके से बात करते रहना और ख़ुद सलाह लेते रहना — यही वो दरवाज़ा खुला रखता है जिससे वो एक दिन अंदर आएगा।
अकेले मत जूझिए। सबल परामर्श: 95093 02114 (call/WhatsApp — परिवार भी call कर सकता है) · राष्ट्रीय Helpline: 14446 · बात कैसे करें · अपने ज़िले का केंद्र खोजें
स्रोत: WHO, NDDTC-AIIMS, Mental Healthcare Act 2017 · Medically reviewed by: Dr. Brij Kishor Saini, MBBS, MD (Psychiatry) · Last updated: August 2026 · अगली समीक्षा: अगस्त 2027
अगला कदम — देर मत कीजिए
पढ़ना पहला कदम है, इलाज दूसरा। अपने ज़िले का सरकारी या मान्यता प्राप्त केंद्र अभी खोजिए, या हमसे सीधे बात कीजिए — जानकारी पूरी तरह गुप्त रहती है।
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यह website शिक्षा और जागरूकता के लिए है और किसी डॉक्टर की सलाह का विकल्प नहीं है। सारी स्वास्थ्य-सामग्री की चिकित्सकीय समीक्षा Dr. Brij Kishor Saini, MBBS, MD (Psychiatry) करते हैं। 14446, 14416, 108/112 भारत सरकार की सेवाएँ हैं — इनका संचालन सबल ट्रस्ट नहीं करता। किसी भी आपातकाल में पहले 108/112 पर call करें।
